Episode

231. ॐ तत् सत्

Podcast
Gita Acharan
Published
Jul 3, 2026
Duration seconds
255
Processing state
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Canonical source
https://www.spreaker.com/episode/231-om-tat-sat--72804305
Audio
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Summary

भगवद्गीता के सत्रहवें अध्याय का शीर्षक ‘श्रद्धा त्रय विभाग योग’ है जिसमें श्रीकृष्ण जीवन और अस्तित्व के प्रत्येक पक्ष के तीन रूपों की व्याख्या करते हैं और कहते हैं कि ‘ॐ तत् सत्’ -ये तीन शब्द परम सत्य, ब्रह्म का त्रिविध प्रतिनिधित्व माने गए हैं। इसी ब्रह्म से ब्राह्मण ग्रन्थ, वेद और यज्ञ उत्पन्न हुए” (17.23)। ‘ॐ तत् सत्’ वेदान्त के संदर्भ में सर्वाधिक प्रचलित वाक्यांश है।ॐ एक मौलिक ध्वनि या कम्पन है। यह माना जाता है कि सृष्टि की उत्पत्ति इसी दिव्य कम्पन ॐ से हुई और विज्ञान भी यह पुष्टि करता है कि सम्पूर्ण पदार्थ निरन्तर कम्पन की अवस्था में रहता है जिसे आवृत्ति (frequency) कहा जाता हैं। ॐ का यह कम्पन तीन अक्षरों -‘अ-उ-म्’ से मिलकर बना है।‘तत्’ का अर्थ ‘वह’ है। ‘तत्’ की व्याख्या ‘सर्वव्यापी सत्य’ के रूप में भी की जाती है। सामान्यतः परमात्मा को ‘तुम’ कहकर संबोधित करना सहज लगता है। परंतु जब हम परमात्मा को ‘तुम’ कहते हैं तो ‘मैं’ भी बना रहता है। इसी कारण श्रीकृष्ण ने ‘तत्’ शब्द का प्रयोग किया है। ‘तत्’ वह अवस्था है जहाँ‘मैं’ और ‘तुम’ दोनों लीन होकर एक हो जाते हैं जैसे नमक की गुड़िया सागर में विलीन होकर स्वयं सागर बन जाती है। यह अस्तित्व के साथ एकाकारहोने की अवस्था का प्रतीक है। वेदांत में इसी भाव को व्यक्त करने के लिए ‘तत् त्वम् असि’ अर्थात् ‘तुम वही हो’ कहा गया है जो मनुष्य और परमात्मा के बीच एकत्व का बोध कराता है।श्रीकृष्ण आगे कहते हैं “इसलिए, दान, तप और यज्ञ जैसे शास्त्रों में निर्दिष्ट सभी कर्मों का आरंभ सदा ‘ॐ’ उच्चारण से किया जाता है (17.24)। जो लोग मुक्ति के इच्छुक हैं और फल की इच्छा नहीं रखते, वे ‘तत्’ का चिंतन करते हुए विविध दान, तप और यज्ञ करते हैं” (17.25)।जहाँ इच्छा या कामना करना ही बन्धन का कारण होता है वहीं इस श्लोक में मोक्ष की इच्छा का उल्लेख किया गया है जो देखने में विरोधाभासी प्रतीत होता है। पहला चरण भौतिक वस्तुओं की इच्छा है, दूसरा चरण मोक्ष की इच्छा है और अंतिम चरण मोक्ष प्राप्त करने की इच्छा का भी त्याग करना है। यह एक क्रमिक विकास यात्रा है जैसे प्राथमि…