Episode
216. भय से पार पाना
- Podcast
- Gita Acharan
- Published
- Mar 20, 2026
- Duration seconds
- 258
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Summary
भगवद्गीता के सोलहवें अध्याय का शीर्षक ‘दैव-असुर सम्पद विभाग योग’ है। इसका अर्थ है दैवी और आसुरी स्वभावों के बीच के भेद को समझकर परमात्मा से एकत्व की प्राप्ति करना। हममें से प्रत्येक व्यक्ति में अनेक गुण होते हैं, जिन्हें दैव (दैवी) और असुर (आसुरी) कहा जा सकता है। दैव वह आंतरिक यात्रा है जो परमात्मा की ओर ले जाती है, जबकि असुर प्रवृत्ति हमें उनसे दूर ले जाती है। श्रीकृष्ण ने ‘अभयं’ (भय का आभाव) को दैवी गुणों में प्रथम बताया है (16.1)। यद्यपि अभयं का अर्थ सामान्यतः निर्भयता के रूप में किया जाताहै, किंतु उसका भावार्थ इससे कहीं अधिक गहन है।भगवद्गीता को समझने के लिए हमें हमेशा तीसरे विकल्प को ध्यान में रखना चाहिए। जैसे कि राग और विराग से परे की तीसरी अवस्था वीत-राग है। इसी तरह, आसक्ति और विरक्ति से परे की तीसरी अवस्था अनासक्ति है। हम आसक्ति/राग या विरक्ति/विराग के द्वंद्वों से भली-भाँति परिचित हैं, लेकिन तीसरी अवस्था तक पहुँचना एक चुनौती है। ऐसा ही 'अभय' भी है, जोभय और निर्भयता दोनों से परे है। जहाँ भय एक आंतरिक भावना की अभिव्यक्ति है, वहीं निर्भयता उस भावना का दमन हो सकता है, हालाँकि, अभय दोनों से परे है।सबसे पहले, मनचाहा फल न मिलने पर भय और क्रोध उत्पन्न होता है। अभय का अर्थ है कर्मफल का त्याग करके, जो भी परिणाम मिले उसे ईश्वर का आशीर्वाद मानकर स्वीकार करना (2.47), और सुख-दुःख, लाभ-हानि और जय-पराजय के बीच आंतरिक संतुलन बनाए रखना (2.38)।दूसरा, मृत्यु हमारा मूलभूत भय है जिसमें हमारी मान्यताओं, प्रतिमानों, अच्छे समय का अंत (मृत्यु) और हमारी संपत्ति की हानि (मृत्यु) भी शामिल है। अभय का अर्थ है 'अपनी मान्यताओं के विपरीत' के परिणामों को स्वीकार करना है, क्योंकि वे भी परमात्मा का ही अंश हैं। वास्तव में, कुछ संस्कृतियाँ अभय प्राप्त करने के साधन के रूप में मृत्यु के उपयोग को प्रोत्साहित करती हैं। श्रीकृष्ण ने परमात्मा की ओर यात्रा में अभय को पहली आवश्यकता के रूप मेंरखा है, क्योंकि सागर में नमक की गुड़िया के घुलने की तरह स्वयं को विलीनकरने के लिए, उनके भयंकर विश्वरूप का सामना करने…