Episode

207. एकनिष्ठ भक्ति

Podcast
Gita Acharan
Published
Jan 14, 2026
Duration seconds
200
Processing state
not_requested
Canonical source
https://www.spreaker.com/episode/207-ekanistha-bhakti--69430877
Audio
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Summary

भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय को ‘गुण त्रय विभाग योग’ कहा जाता है, जिसमे गुणों और गुणातीत की व्याख्या की गई है। श्रीकृष्ण इस अध्याय का समापन गुणों से परे जाने का उपाय बताते हुए करते हैं और कहते हैं, "जो लोग अनन्य (अव्यभिचारेण) भक्ति के साथ मेरी सेवा करते हैं, वे तीनों गुणों से ऊपर उठकर ब्रह्म (गुणातीत) के स्तर पर पहुँच जाते हैं (14.26), क्योंकि मैं ही उस निराकार ब्रह्म का आधार हूँ जो अमर, अविनाशी, शाश्वत धर्म और असीम दिव्य आनंदस्वरूप है” (14.27)। श्रीकृष्ण 'व्यभिचारेण' शब्द का प्रयोग करते हैं, जिसका अर्थ है अनेक इच्छाएँ। 'अव्यभिचारेण भक्ति' एकनिष्ठ भक्ति है। इसी संदर्भ में, श्रीकृष्ण ने इसे इंगित करने के लिए 'अवेश्य' का प्रयोग किया (12.2)। मूलतः, यह अनेक मनों से परे होकर ईश्वर के प्रति एकनिष्ठ भक्ति है जो हमें गुणातीत बना देगा।सबसे पहले, गुणातीत यह समझकर कर्तापन का भाव त्याग देता है कि किसी भी कर्म का कोई कर्ता नहीं है और सभी कर्म विभिन्न गुणों के परस्पर प्रक्रिया का परिणाम हैं।दूसरे, उसे यह बोध हो जाता है कि दूसरे भी अपने द्वारा किए गए किसी भी कर्म के लिए उत्तरदायी नहीं हैं। परिणामस्वरूप, वह सम्मान या अपमान से प्रभावित नहीं होता, क्योंकि दोनों ही गुणों की परस्पर क्रिया है, जिसका परिणाम शत्रुता का त्याग है।अंततः, उसे यह बोध होता है कि सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण सुखद और अप्रिय परिस्थितियाँ उत्पन्न करने में सक्षम हैं। अतः, वह अब ऐसीपरिस्थितियों से प्रभावित नहीं होता। इसी प्रकार, वह प्रशंसा और आलोचना से भी प्रभावित नहीं होता, क्योंकि वह समझता है कि ये गुणों के कारणहोते हैं। गुणातीत की यह अवस्था आनंद की अवस्था है और यही हम सभी के जीवन का लक्ष्य होना चाहिए।