# 205. गुण- दासता से प्रभुत्व तक Page: https://stenobird.com/podcast/gita-acharan-7048266/205 Text version: https://stenobird.com/podcast/gita-acharan-7048266/205.md Podcast: [Gita Acharan](https://stenobird.com/podcast/gita-acharan-7048266) Published: 2025-12-31T02:08:00+00:00 Episode link: https://www.spreaker.com/episode/205-guna-dasata-se-prabhutva-taka--69256252 Audio file: https://api.spreaker.com/download/episode/69256252/7569e624_4ee9_aacb_95cc_97667c1d790f.mp3 Processing state: not_requested JSON: https://stenobird.com/v1/public/podcasts/gita-acharan-7048266/episodes/205 Duration seconds: 241 ## Resource यह समझाने के बाद कि सत्व, रजस् और तमस् नामक तीन गुण आत्मा को भौतिक शरीर से बांधते हैं, श्रीकृष्ण इन गुणों को पार करके गुणातीत या निर्गुण बनने के लिए कहते हैं। अर्जुन ने तुरंत पूछा कि इन तीनों गुणों से अतीत पुरुष के लक्षण क्या हैं, उसका आचरण कैसा होता है और वह इन तीनोंगुणों से कैसे परे जाता है (14.21)।श्रीकृष्ण कहते हैं, "तीनों गुणों से अतीत मनुष्य सत्वगुण से उत्पन्न प्रकाश, रजोगुण से उत्पन्न कर्म, और तमोगुण से उत्पन्न मोह के उपस्थित होने पर उनसे घृणा नहीं करते और अनुपस्थित होने पर उनकी लालसा नहीं करते (14.22)। वे उदासीन रहते हैं, गुणों से विचलित नहीं होते; वे यह जानकर कि सृष्टि में केवल गुण ही कार्यरत हैं, आत्मा में दृढ़ और केंद्रित रहते हैं” (14.23)। यह न तो गुणों की किसी भी अभिव्यक्ति के साथ लगाव (राग या आसक्ति) है और न ही वैराग्य (विराग या विरक्ति) है। श्रीकृष्ण ने ऐसी शाश्वत स्थिति का वर्णन करने के लिए वीतराग या अनासक्ति का उपयोग किया था। दूसरे, ऐसीपरिस्थिति में, श्रीकृष्ण ने इससे पहले हमें घृणा का त्याग करने की सलाह दी थी, लेकिन कर्म का नहीं। तीसरा, यह गुणों को अपना दास बनाने के बारे में है। जब हमें सोने की आवश्यकता हो, तो तमोगुण का आह्वान करें; जब हमें कोई कार्य करना हो, तो रजोगुण का उपयोग करें; सीखने के लिए सत्वगुण का प्रयोग करें। यह दासता की अवस्था से गुणों के प्रभुत्व की ओर बढ़ना है।उस अवस्था में, व्यक्ति को यह बोध होता है कि इन तीनों गुणों के अलावा कोई कर्ता नहीं है। इन तीनों के बीच की परस्पर क्रिया ही कर्म का कारण बनती है,लेकिन यह हमारे या किसी और के कारण नहीं होता।एक मार्ग है कर्म को कर्मफल से अलग करना, यह समझकर कि कर्मफल कई कारकों पर निर्भर करता है। दूसरा है कर्ता को कर्म से अलग करना,यह समझकर कि तीनों गुण ही वास्तविक कर्ता हैं। दोनों ही मार्ग निर्-अहंकार (मैं कर्ता हूँ की भावना से मुक्ति) की ओर ले जाते हैं। इस प्रकार व्यक्ति स्वयं में केंद्रित होता है और श्रीकृष्ण ने इसे आत्मरमण या नित्यतृप्त (सदैवसंतुष्ट) कहा है। ## Actions - request_transcript: `POST https://stenobird.com/v1/public/podcasts/gita-acharan-7048266/episodes/205/transcription-requests` — Idempotently request low-priority transcript generation for this episode. - read_markdown: `GET https://stenobird.com/podcast/gita-acharan-7048266/205.md` — Read the agent-friendly Markdown representation of this episode resource. A page view does not enqueue transcription. Agents should invoke `request_transcript` explicitly when they need this episode processed. ## Transcript Full transcripts are not published on public pages unless there is a clear rights basis.